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mahboob

जानेमन चलो तुम्हें कश्मीर दिखा दूँ, जमीन पे जन्नत इसी को कहते हैं, जो भी हो तुम बहोत खूब हो , तुम्हें ही तो महबूब कहते हैं

चांद

तेरे शरमाने से चांद शर्माना भूल जाता है, हुस्न तो तूने चांद को दिया है, क्यों तू मेरा दिल तोड़ कर चली जाती है, इतना तो बता ए चांद तू अपने चकोर को  छोड़ कर कहाँ  चली जाती है. 

दिल के आईने में

राही हूँ मैं तेरा साथी ये सफर तो देखो, जी भर के तुझे देखूँ कभी दिल के आईने में उतर के तो देखो