गज़ल
मोहब्बत में ना सही, नफरत में अपनी दो चार सुनाया करो, तेरी गाली भी मुझे ईमरती लगती है, खिड़की पे तो रोज मुलाकात होती है। कभी गली में भी मुझसे मिलने आ जाया करो।
ये ब्लॉग सच्ची कहानी पर आधारित है इसके पात्र के नाम काल्पनिक हैं इससे किसी व्यक्ति के नाम स्थान को जोड़ा जाता है तो ये केवल एक संयोग है