अमर फल




ये कहानी उज्जैन नगरी की है l जहाँ राजा भर्तिहरि का शासन था l राजा भर्तिहरि एक सदाचारी और न्यायप्रिय राजा थे l राजा भर्तिहरि अपनी पत्नी रानी पिंगला से बहुत प्यार करते थे l रानी पिंगला रूप सौंदर्य की मालकिन थी एक कमनीय नारी थी l राजा भर्तिहरि रानी पिंगला के प्यार में जैसे पागल थे l पर भाग्य का खेल बहुत निराला था l एक दिन रानी अपने शयनकक्ष की खिड़की से अस्तबल की तरफ देख रही थी, रानी पिंगला एक अश्वपाल पर मरती थी जिसकी लम्बी कद काठी और गठीला शरीर था l रानी पिंगला उस अश्वपाल से रोज अकेले में मिला करती थी l लेकिन एक दिन राजा भर्तिहरि के छोटे भाई विक्रमादित्य ने रानी पिंगला को अस्तबल की तरफ से आते देख लिया l विक्रमादित्य ने सोचा ये बात राजा भर्तिहरि को बतानी चाहिए l विक्रमदित्य जैसे ही राजा से मिलने पहुंचे उसे पहले ही पिंगला ने राजा से मिलकर ये कहा की महाराज विक्रमादित्य की बुरी नजर मुझ पर है, राजा भर्तिहरि उसकी बातों में आ गए l राजा भर्तिहरि ने विक्रमादित्य को बिना सोचे समझे को राज्य से निकाल दिया l उसी समय सिद्ध गुरु गोरखनाथ उज्जैन राज महल पहुंचे, राजा ने उनका खूब आदर सत्कार किया, राजा की आतिथ्य सेवा से खुश होकर गुरु गोरखनाथ ने राजा को एक फल दिया और कहा राजन ये अमर फल लो, इसे खाकर तुम अमर हो जाओगे l राजा भर्तिहरि ने वह अमर फल ले लिया और सोचा की यह अमर फल मैं रानी पिंगला को दे देता हुं तो  वो हमेशा सुन्दर और यौवन से पूर्ण रहेगी क्यों की राजा भर्तीहरि रानी पिंगला से अपने प्राणो से भी ज्यादा प्यार करते थे l राजा ने वह फल रानी पिंगला को दे दिया l रानी पिंगला ने यह सोचा की अगर यह अमर फल मैं उस अश्वपाल को दे दूँ  तो इसे खाकर वह हमेशा जवान बना रहेगा और मुझे तृप्त करता रहेगा l यह सोच रानी पिंगला ने वह अमर फल उस अश्वपाल को दे दिया l और अश्वपाल ने उस अमर फल को नगर की एक वेश्या को दे दिया क्यों की अश्वपाल उस वेश्या पर मोहित था l वेश्या ने अमर फल पाकर यह सोचा की अगर मैं यह अमर फल राजा को दे दूँ  तो राजा इसे खाकर आजीवन हमलोगों की रक्षा करेगा और प्रजा सुखी से रहेगी l यह सोच वेश्या राजा के दरबार में पहुंची l और बोली राजन यह अमर फल मैं आपके लिए लायी हुं इसे खाकर आप अमर हो जायेंगे और प्रजा सुखी से रहेगी, राजा भर्तिहरि उस अमर फल को देखकर आश्चर्य चिकित् हो गए और  वेश्या से पूछा यह फल तुम्हें किसने दिया l वेश्या ने अश्वपाल का नाम लिया l राजा ने अश्वपाल को एकांत में बुलाया और कहा, अश्वपाल, सच बताओ यह फल तुम्हें किसने दिया  अन्यथा मैं तुम्हें मृत्युदंड दूंगा, यह सुन अश्वपाल थर थर कापने लगा और बोला महाराज यह फल मुझे रानी पिंगला ने दिया है  यह सुन राजा भर्तिहरि के होश उड़ गए वो शोक में डूब गए कि जिस रानी पिंगला से मैं अपने प्राणो से भी ज्यादा प्यार करता था उस स्त्री ने मेरे साथ छल किया l पिंगला ने मुझे धोखा दिया l ये संसार छल कपट  से भरा हुआ है चारों तरफ वासना का घिनौना खेल है यहाँ प्रेम नही है l बस वासना है l उन्हें अपने किये पर बहुत पछतावा हुआ कि अपनी पत्नी कि झूठी बातों में आकर मैंने अपने छोटे भाई विक्रमादित्य को राज्य से निकाल दिया l राजा ने सैनिकों को आदेश दिया कि विक्रमादित्य को ढूंढकर लाओ, सैनिकों ने विक्रमदित्य को ढूंढकर दरबार में पेश किया l राजा भर्तिहरि ने अपने छोटे भाई विक्रमादित्य से अपने किये कि क्षमा मांगी l पिंगला से प्यार में धोखा खाकर राजा भर्तिहरि का ह्रदय बहुत आहत था इस झुठे संसार का त्याग कर उन्होंने वैराग्य धारण कर लिया, सारा राजपाट अपने छोटे भाई विक्रमा दित्य को सौंप कर वो तपस्या करने चले गये l अभी भी उज्जैन में राजा भर्तिहरि गुफा मौजूद है जहाँ वो तपस्या कर रहे हैं l
 

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