श्रीमदभागवतम

ये कहानी श्रीमदभागवत पुराण की है जो महर्षि वेद व्यास द्वारा लिखित है प्राचीन काल में तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित एक ग्राम में आत्मदेव नामक ब्राह्मण अपनी पत्नी धुंधली के साथ रहते थे आत्मदेव एक धनी ब्राह्मण थे उन्हें धन की कोई कमी नहीं थी पर उन्हें अपनी संतान नहीं होने का दुख था इस कारण वह बहुत दुखी रहते थे l उन्हें बस यही चिंता सता रही थी कि संतान प्राप्ति नहीं होने के कारण मुझे नरक की प्राप्ति होगी मेरे धन का कौन सुख भोग करेगा यह सोच विचार कर अपने जीवन को अर्थहीन समझकर वे अपने प्राण त्यागने के विचार से जंगल की तरफ चल दिए जहां उन्हें एक साधु मिला और उन्होंने आत्मदेव से पूछा कि तुम बहुत दुखी मालूम पड़ते हो क्या बात है l तभी आत्मदेव ने अपनी संतान हीनता की बात बताई कहा बिना संतान के मुझे मुक्ति कैसे मिलेगी, मैं नरक में जाउंगा लगता है मेरे पितर मुझसे नाराज हैं l मेरे घर की गाय भी बाँझ हैं मेरे दुख को दूर कीजिये, बिना पुत्र के मेरा जीवन व्यर्थ है
इस पर साधु ने कहा प्रकृति से कभी खेलना नही चाहिए यही नियती है तुम्हारे जीवन में , तुम्हारे जीवन में संतान सुख नही है और आगे सात जन्म तक तुम्हें संतान का सुख नहीं है l अच्छा है इन सब चीजों में तुम ना पढ़कर अपना जीवन भगवान को समर्पित कर दो और मोक्ष को प्राप्त करो l पर आत्मदेव अपनी अल्प बुद्धि के कारण अपनी जिद पर अड़े रहे तब साधु ने आत्म देव को एक फल देते हुए कहा की जाओ यह फल अपनी पत्नी को खिला देना इससे तुम्हें एक पुत्र की प्राप्ति होगी.लेकिन याद रहे इस बीच तुम्हारी पत्नी सत्य का पालन करेगी, भागवत अर्चना और पूजा पाठ में अपना जीवन बितायेगी , केवल एक समय भोजन करेंगी lआत्मदेव वह फल लेकर खुशी-खुशी वहां से चल दिया और घर पहुंच कर अपनी पत्नी धुंधली को वो फल देते हुए कहा लो यह फल, इस फल को खाने से तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी पर धुंधली उस फल को लेकर ये सोचने लगी कि अगर मैंने इस फल खा लिया तो मुझे नौ महीने कष्ट भोगना पड़ेगा और कहीं शुकदेव गोस्वामी की तरह ये मेरे पेट में 12 साल रह गया तो, मेरा पेट भी फुल जाएगा मेरे शरीर की खुबसुरती बिगड़ जाएगी ये सब सोच वो बहुत डर गई और उसने वह फल अपने घर के आंगन में जो बँधी गाय थीं उसे खिला दिया l धुंधली की छोटी बहन जो गर्भ से थीं उससे कहा तुम्हें जब पुत्र होगा तो तुम मुझे उसे दे देना मैं तुम्हें उसके बदले बहुत सारा धन दूँगी l उसकी छोटी बहन धुंधली की बात मान गयी l 9 महीने बाद धुंधली की छोटी बहन ने एक पुत्र को जन्म दिया जो उसने धुंधली को दे दी l धुंधली ने उस पुत्र को आत्मदेव को देते हुए कहा देखो भगवान ने हमारी सुन ली, देखो हमें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है आत्मदेव बहुत ही खुश हुए उन्होंने कहाँ धुंधली के पुत्र का नाम धुंधकारी lआज से इसका नाम धुंधकारी है l तभी आश्चर्य घटना घटी, आत्मदेव के आँगन में बंधी गाय ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया lआत्म देव ने आश्चर्य से गाय के उस पुत्र को अपने गोद में उठा लिया l उसका सारा शरीर मनुष्य का था और कान बड़े-बड़े बिल्कुल गाय की तरह, आत्म देव ने गाय के उस पुत्र को अपने गोद में लेकर कहा कि इसके कान गाय की तरह हैं इसलिए इसका नाम आज से गोकर्ण है l 
दोनों भाई एक साथ जवान हुए धुन्धकारी बचपन से ही बहुत दुराचारी था उसका कोई भी आचरण ब्राह्मणो के समान नहीं था वह सभी से द्वेष रखता था वह बहुत ही क्रोधी स्वभाव का था lस्नान शौचादि आचरण ब्राह्मणों की भांति नही था l वह छिप कर दूसरों के घरों में आग लगा देता था बालकों को खेलाने के बहाने उसे कुएँ डाल देता था l उसने अपने घर से सारा धन लेकर जुए में नष्ट कर दिया lलेकिन इधर दूसरा भाई गोकर्ण बिलकुल उसके विपरीत था lगोकर्ण बहुत ही सदाचारी वेदों का अध्ययन करने वाला धर्म निष्ठ ब्राह्मण था उसके सारे आचारण ब्राह्मणोचित थे lधुंधली धुंधकारी को बहुत मान दुलार करती थी लेकिन गोकर्ण की उपेक्षा किया करती थी कभी उसे ताने भी दिया करती धुंधली के इस व्यवहार के कारण गोकर्ण बहुत दुखी हो जाता था lआत्मदेव धुंधली को फटकारता कि तुम्हारे लाड प्यार ने इसे बिगाड़ दिया है एक दिन तुम बहुत पछताओगी हुआ भी ऐसा ही, जुए की लत में धुंधकारी ने घर का सारा धन नष्ट कर दिया दिया l वह रोज शराब पिता और घर आकर माता पिता को मारता पिटता l एक दिन आत्मदेव अपने पुत्र धुंधकारी के अत्याचार से दुखी हो गोकर्ण से कहा l पुत्र गोकर्ण बता मैं क्या करूँ,  मेरे इस दुराचारी पुत्र ने मेरा जीना मुश्किल कर दिया है l गोकर्ण ने पिता को उपदेश किया l पिता जी आप भाग जाइये यह संसार दुख का अथाह सागर है धन किसका पत्नी किसकी पुत्र किसका l यह शरीर हाड़ मांस का पिंड है इस शरीर को अपना मत मानो यह तो नष्ट होना ही है पिताजी आप वन में चले जाइए lभजन ध्यान भगवान के गुण लीलाओं का गान कीजिए श्रीमद्भागवत का पाठ कीजिए भगवान श्री कृष्ण की कृपा से आपको अवश्य मोक्ष की प्राप्ति होगी l आत्मदेव बैराग्य धारण कर जंगल चले गए और दृढ संकल्प होकर श्रीमद्भागवत का पाठ करने लगे l भगवान के भक्ति, ध्यान, भजन में लीन हो गए और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें दर्शन दिए और वो गोलोकवासी हो गए l गोकर्ण बडे विद्वान और धर्मात्मा पुरुष थे l गोकर्ण ने अंतदृष्टि से यह जान लिया कि पिताजी श्री कृष्ण को प्राप्त हो गये है वे हम लोगों के बीच नहीं हैं l गोकर्ण ने यह बात अपनी माँ धुंधली को बताई lअपने पति के संसार छोड़ने की बात सुन धुंधली विलाप करने लगी और इधर धुंधकारी रोज नशे में धुत रहता और वह वेश्यागमन करने लगा, जुआ खेलता मद्यपान करता, देर रात घर आता, माँ को मारता पिटता l एक दिन धुंधली अपने पुत्र के अत्याचार से दुखी होकर  घर से भाग गई और गांव के बाहर एक कुएं में कूद कर आत्महत्या कर ली l गोकर्ण भी घर छोड़ कर तीरथाटन को चला गया l इधर धुंधकारी पांच वेश्याओं के साथ घर में अकेले रहने लगा l धुंधकारी रोज चोरी करता धन लूट कर लाता और उन वेश्याओं के साथ भोग विलास में डूबा रहता l एक दिन धुंधकारी को चोरी करते राजा के सैनिकों ने देख लिया और उसे पकड़ने के लिए दौड़े,  धुंधकारी राजा के सैनिकों को देखकर वहां से भागा और भागता -भागता अपने ही घर में जाकर छिप गया l राजा के सैनिक जब चोर को ढूंढते हुए उसके घर पहुंचें और दरवाजा खटखटाया तो धुंधकारी घर से निकाला और पूछा बताइये क्या बात है l राजा के सैनिकों ने धुंधकारी को देखकर बोला, हमलोग चोर को ढूंढ रहे थे ये तो धर्मनिष्ठ ब्राह्मण आत्मदेव जी का घर है चोर यहाँ कहाँ से आया l ये बात बोलकर राजा के सैनिक वहां से चले गये lऔर इस तरह राजा के सैनिकों से धुंधकारी ने अपनी जान बचा ली l वेश्याओं ने यह सोचा जो धन यह लूटकर लाता है एक दिन राजा के सैनिक हमें पकड़ लेंगे और मृत्युदंड देंगे, क्यों ना धुंधकारी को मार कर सारा धन लेकर यहां से भाग निकले और उन पांचो वेश्याओं ने मिलकर जहां धुंधकारी सो रहा था उसके मुंह में आग लगाकर उसे मार डाला और धुंधकारी अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ l 
कुछ समय पश्चात् जब गोकर्ण अपने गांव लौटा तो उसने अपने घर को देखा जहां वो रहता था अपने पिता आत्मदेव के साथ l उसका घर एक खंडहर बन चूका था, उसने घर के अंदर देखा तो बस वीरान सा वो घर, बड़ा डरावना प्रतीत होता था, जहाँ धूधकारी को अकाल मृत्यु प्राप्त हुईं थीं l तभी उसने देखा जैसे कोई काली छाया इधर से उधर चली गयी l गोकर्ण के कान में एक सरसराहट सी हुई जैसे उसे किसी ने बुलाया हो गोकर्ण l गोकर्ण ने अंदेखा किया फिर किसी ने जैसी उसे आवाज दी हो हो गोकर्ण, गोकर्ण तुरंत पहचान गया ये तो मेरे भ्राता धुंधकारी की आवाज है गोकर्ण समझ गया था मेरे भाई की अकाल मृत्यु हुई है और वो प्रेत बन चूका है गोकर्ण तुरत  हाथ में जल लेकर उस जगह पर छिड़क दिया तभी प्रेत बना धुंधकारी उसके सामने खड़ा गया और वह रो रहा था l प्रेत बना धुंधकारी रोते हुए गोकर्ण से बोला भाई मैं अपने कर्मों की सजा भुगत रहा हूं मैं बहुत कष्ट में हूं और प्रेत बन चुका हूं l तभी गोकर्ण ने धुंधकारी से कहा, मैंने तो आपका पिण्डदान सारे श्राद्ध कर्म अच्छे से कर दिया था फिर भ्राता आपकी ये स्थिति कैसे हो गयी आप प्रेत कैसे बन गये l धुंधकारी ने उसे सारी बातें बताई कैसे वो वेश्यागामी हो गया और उन वेश्याओं ने उसे जलाकर मार डाला l मुझे मेरे बुरे कर्मों की सजा मिली मैं अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ अब में प्रेत बन चूका हूं lमुझे पानी भी नहीं मिलता मैं बहुत कष्ट में हूं प्रेत योनी से मेरा उद्धार करो गोकर्ण l गोकर्ण ने धुंध कारी से कहां मैंने तुम्हारा श्राद्ध पिंडदान इत्यादी सारे कर्म किए थे तब धुंधकारी बोला ऐसे हजारों श्राद्ध पिंडदान से मेरा उद्धार नहीं हो सकता मेरे कर्म बहुत बुरी थे l मुझे प्रेत योनि से मुक्ति दिलाओ l तब गोकर्ण ने धुंधकारी से कहा की भ्राता धुंधकारी मैं तुम्हारी मुक्ति का उपाय ढूंढता हूं तब तक तुम इसी घर में रहो और मेरी प्रतीक्षा करो गोकर्ण ने बहुत सारे संत महात्माओं से इसका उपाय पूछा पर इस समस्या का कोई हल नहीं निकला l तब फिर एक दिन प्रातः काल स्नान करने के बाद गोकर्ण ने सूर्य देव की उपासना की और अपने तपोबल से सूर्य देव को स्तंभित कर दिया अपने इस स्तंभण का कारण सूर्यदेव ने गोकर्ण से पूछा, गोकर्ण ने सूर्यदेव से अपने भ्राता धुंधकारी की प्रेत योनि से उद्धार का उपाय पूछा, सूर्यदेव ने गोकर्ण से कहा इसका बस एक ही उपाय है अगर श्रीमद्भागवत का एक सप्ताह का पाठ तुम श्रद्धा पूर्वक अपने भ्राता धुंधकारी के लिए करो तो भगवान श्री कृष्ण की कृपा से उसे अवश्य प्रेत योनि से मुक्ति मिलेगी l यह कहकर सूर्य देव अंतध्यान हो गये l
गोकर्ण ने श्रीमद्भागवत के साप्ताहिक पाठ का आयोजन किया गोकर्ण ने श्रीमद्भागवत के पाठ से पहले धुंधकारी का आह्वान किया, धुंधकारी के आने पर गोकर्ण ने उससे कहा भ्राता तुम स्थिर होकर एक जगह बैठकर श्रद्धापूर्वक इस भागवत कथा को सुनो  पर  प्रेत शरीर के कारण हवा धुंधकारी को उड़ा ले जाती थी जिससे वह एक स्थान पर टिक नहीं पाता था ताकि वह कथा को ध्यान से सुन सके तब गोकर्ण ने धुंधकारी से कहा भ्राता तुम इस बांस के अंदर बैठ कर भागवत कथा को सुनो तब धुंधकारी बांस के छेद अंदर बैठ कर भागवत कथा को सुनने लगा l गोकर्ण श्रीमद्भागवत कथा का पाठ करने लगे और धुंधकारी बांस के छिद्र में प्रवेश कर स्थिर चित होकर भागवत कथा सुनने लगा l जैसे ही भागवत कथा समाप्त होती, कथा के अंत में एक बांस हर रोज चटक जाती l ऐसे ही भागवत कथा के सात दिन बीत गए l 7 दिनों में सात बांस चटक गए, धुंधकारी स्थिर होकर श्रद्धा के साथ भागवत कथा सुनता रहा lजैसे ही भागवत कथा समाप्त हुई धुंधकारी दिव्य शरीर को प्राप्त हो गया, उसे प्रेत योनि से मुक्ति मिल गयी lउसी समय एक दिव्य विमान प्रकट हुआ जिसमें बैठ कर धुंधकारी  भगवान के परम धाम चला गया,श्री कृष्ण स्वरूप को प्राप्त हो गया, ऐसी है श्रीमद्भागवत की महिमा, जिस भागवत कथा को सुनकर धुंधकारी जैसे महापापी का भी उद्धार हो गया।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अमर फल

मर्लिन मुनरो - भाग 1

कुत्ते का रोना